सभी जिलाधिकारियों और मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को भेजा यह फरमान
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में अब डॉक्टरों के खिलाफ सीधे गिरफ्तारी की कार्रवाई नहीं की जा सकेगी। ऐसे मामलों में पहले जिला स्तरीय मेडिकल बोर्ड जांच करेगा और उसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। शिकायतों के निस्तारण में एक निर्धारित प्रक्रिया अपनाने के लिए शासन ने मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। इसे प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों और मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को भेज दिया गया है। शासन के निर्देश के मुताबिक, चिकित्सकीय लापरवाही से संबंधित शिकायतों की जांच के लिए जिला स्तर पर मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाएगा। शिकायत मिलने पर जिलाधिकारी उसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी को भेजेंगे। इसके बाद संबंधित बोर्ड को तीन दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी होगी। मामलों की प्रदेश स्तर पर सुनवाई और समीक्षा के लिए राज्य मेडिकल बोर्ड भी गठित किया जाएगा। राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड की अध्यक्षता चिकित्सा एवं स्वास्थ्य महानिदेशक करेंगे। इसमें चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशक (डीजीएमई) की ओर से नामित फॉरेंसिक मेडिसिन के प्रोफेसर, केजीएमयू, एसजीपीजीआई, लोहिया संस्थान और अन्य मेडिकल कॉलेजों से दो प्रोफेसर, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) का एक प्रतिनिधि तथा चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ओर से नामित विधि अधिकारी सदस्य होंगे। स्वास्थ्य महानिदेशालय से संयुक्त निदेशक स्तर के अधिकारी को सदस्य सचिव बनाया जाएगा। पांच मई 2026 को जारी एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, देश में चिकित्सकीय लापरवाही के दर्ज मामलों की संख्या वर्ष 2022 में 118 थी, जो 2024 में बढ़कर 869 हो गई। इनमें उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 458 मामले दर्ज किए गए, जो देश के कुल मामलों का 52.70 प्रतिशत है। चिकित्सकीय लापरवाही से जुड़े मामलों में स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित करने की मांग के बीच हाईकोर्ट ने भी शासन को एसओपी जारी करने का निर्देश दिया था। इसके बाद शासन ने शिकायतों की जांच और निस्तारण के लिए यह व्यवस्था लागू की है।

