आजमगढ़ : एंबुलेंस के इंतजार में बुझ गई मासूम की जिंदगी, पिता की गोद में तोड़ा दम

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परिजनों ने डेढ़ घंटे तक एंबुलेंस का इंतजार करने का लगाया आरोप
आजमगढ़। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कथित लापरवाही ने एक 11 वर्षीय मासूम की जिंदगी छीन ली। मऊ जिले के रानीपुर फतेहपुर निवासी अंश की तबीयत बिगड़ने के बाद उसे समय पर 108 एंबुलेंस नहीं मिलने का आरोप है। परिजनों का कहना है कि इलाज के लिए वाराणसी ले जाने में हुई देरी के कारण रास्ते में ही पिता की गोद में उसकी मौत हो गई। इस घटना ने एक बार फिर आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं और रेफरल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार, बुधवार शाम अंश की तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिजन उसे पहले चिरैयाकोट के एक निजी अस्पताल ले गए, जहां प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने गंभीर स्थिति देखते हुए राजकीय मेडिकल कॉलेज, चक्रपानपुर रेफर कर दिया। मेडिकल कॉलेज में जांच के दौरान चिकित्सकों ने बताया कि बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर की आवश्यकता है, लेकिन वहां कोई वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं था। इसके बाद उसे बीएचयू, वाराणसी रेफर कर दिया गया। पीड़ित पिता अमित का आरोप है कि उन्होंने 108 एंबुलेंस सेवा पर कई बार फोन किया, लेकिन हर बार उन्हें केवल "10 मिनट में एंबुलेंस पहुंचने" का आश्वासन मिलता रहा। उनका कहना है कि करीब डेढ़ घंटे तक इंतजार करने के बावजूद एंबुलेंस नहीं पहुंची, जबकि इस दौरान बच्चे की हालत लगातार बिगड़ती रही। सरकारी एंबुलेंस न मिलने पर परिजनों ने उधार और मदद से निजी एंबुलेंस की व्यवस्था की और बच्चे को वाराणसी के लिए रवाना किया। हालांकि बीएचयू पहुंचने से पहले ही रास्ते में अंश ने पिता की गोद में अंतिम सांस ले ली। मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक डॉ. कृष्णकांत ने बताया कि बच्चे के फेफड़ों में पानी भर गया था और उसकी हालत बेहद गंभीर थी। उन्होंने कहा कि बीएचयू से भी संपर्क किया गया था। वहीं, पिता अमित का कहना है कि यदि समय पर एंबुलेंस मिल जाती तो शायद उनके बेटे की जान बचाई जा सकती थी। हालांकि, 108 एंबुलेंस सेवा के प्रभारी अजय ने परिजनों के आरोपों से अलग दावा करते हुए कहा कि जिले में 108 एंबुलेंस का औसत रिस्पांस टाइम सात मिनट है। उनके अनुसार, बुधवार रात पहला कॉल 9:09 बजे प्राप्त हुआ था और रात 9:45 बजे एंबुलेंस मेडिकल कॉलेज पहुंचकर मरीज को ले जाने के लिए तैयार थी। वहीं, 108 सेवा के रीजनल मैनेजर सुमित सिंह ने बताया कि राजकीय मेडिकल कॉलेज से प्रतिदिन 15 से 16 मरीज रेफर होते हैं। मेडिकल कॉलेज में दो से तीन एंबुलेंस तैनात रहती हैं, लेकिन कई बार वे अन्य रेफर मरीजों को ले जाने में व्यस्त होती हैं। इस हृदयविदारक घटना के बाद परिजनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। वहीं, घटना ने आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं, एंबुलेंस की उपलब्धता और गंभीर मरीजों के लिए पर्याप्त वेंटिलेटर जैसी सुविधाओं को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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