आजमगढ़ ब्रेकिंग : पहले अनुमोदन फिर किया निरस्तीकरण

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स्थायी नियुक्ति का मुहरनामा लगा, फिर खुली फाइल—प्रधानाचार्या व शिक्षकों के अनुमोदन पर उठे सवाल
वित्तविहीन’ का मंत्र, कूटरचित तथ्य और गुमराह हस्ताक्षर—डीआईओएस ने खुद का ही आदेश किया रद्द
आजमगढ़। जिला विद्यालय निरीक्षक, आजमगढ़ द्वारा श्री देवानन्द संस्कृत उच्च माध्यमिक विद्यालय, दानशनिचरा रामगढ़ में प्रधानाचार्या एवं शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर जारी किया गया अनुमोदन आदेश अब खुद ही सवालों के घेरे में आ गया है। पहले जिस आदेश को पूरे विधि-विधान के साथ जारी किया गया, वही आदेश कुछ ही समय बाद “गंभीर तथ्यों के छिपाए जाने” की आड़ में तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया। प्रबन्ध समिति के प्रस्ताव एवं प्रबन्धक के पत्र दिनांक 07 मार्च 2025 के आधार पर जारी आदेश में रिंकी यादव को 30 सितंबर 2024 से प्रधानाचार्या, जबकि प्रियंका एवं अल्का त्रिपाठी को 11 फरवरी 2025 से साहित्य विषय की शिक्षिका के रूप में नियुक्ति का अनुमोदन प्रदान किया गया था। तीनों की नियुक्ति को स्थायी प्रकृति का बताते हुए विद्यालय प्रबंधन को विधिवत अवगत भी करा दिया गया था। लेकिन कहानी में मोड़ तब आया, जब 09 फरवरी 2026 को जारी इसी अनुमोदन आदेश को जिला विद्यालय निरीक्षक वीरेन्द्र प्रताप सिंह ने खुद ही निरस्त कर दिया। पत्र के अनुसार, संयुक्त शिक्षा निदेशक आजमगढ़ मंडल कार्यालय में कार्यरत प्रधान सहायक विधि चन्द यादव पर आरोप है कि उन्होंने कूटरचित ढंग से तथ्य छिपाकर यह कहकर हस्ताक्षर करा लिए कि संबंधित विद्यालय वित्तविहीन मान्यता प्राप्त है, जबकि वास्तविक स्थिति को पत्रावली में सही रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया। यानि पहले अनुमोदन हुआ, फिर जांच हुई और अंत में आदेश ही अपास्त कर दिया गया। इस पूरे प्रकरण ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सवाल यह नहीं कि नियुक्तियां वैध थीं या नहीं, बल्कि यह है कि बिना समुचित परीक्षण के अनुमोदन की मुहर कैसे लग गई? फिलहाल आदेश निरस्तीकरण के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा हुआ है और माना जा रहा है कि मामला केवल आदेश वापसी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आगे विभागीय जांच और कार्रवाई का दायरा भी बढ़ सकता है। अनुमोदन की इस ‘आनन-फानन परंपरा’ ने यह जरूर साबित कर दिया कि फाइलें पहले चलती हैं, सच्चाई बाद में तलाश की जाती है।

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