मृदा स्वास्थ्य बचाने और प्रदूषण रोकने के लिए प्रशासन सख्त, किसानों को मशीनों से प्रबंधन की सलाह
आजमगढ़। जनपद के किसानों से फसल अवशेष (पराली) न जलाने की अपील की गई है। कृषि विभाग ने स्पष्ट किया है कि फसल अवशेष जलाने से न केवल मृदा की उर्वरता प्रभावित होती है, बल्कि वातावरण भी गंभीर रूप से प्रदूषित होता है। इससे खेतों में मौजूद लाभदायक पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और मिट्टी की भौतिक, रासायनिक व जैविक संरचना पर प्रतिकूल असर पड़ता है।अधिकारियों ने बताया कि पराली जलाने से उत्पन्न धुआं व गैसें वायु गुणवत्ता को खराब करती हैं, जिससे आंखों में जलन, त्वचा रोग, श्वसन तंत्र की समस्याएं तथा हृदय व फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही खेतों में मौजूद लाभदायक जीव व मित्र कीट भी नष्ट हो जाते हैं, जिससे कृषि उत्पादन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे फसल अवशेषों का प्रबंधन आधुनिक कृषि यंत्रों जैसे हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, जीरो टिल ड्रिल, मल्चर आदि के माध्यम से करें और अवशेषों को सड़ाकर खाद में परिवर्तित करें। इसके लिए जनपद में कस्टम हायरिंग सेंटर व फार्म मशीनरी बैंक स्थापित किए गए हैं, जहां से किसान किराये पर यंत्र प्राप्त कर सकते हैं। प्रशासन ने यह भी चेतावनी दी है कि फसल अवशेष जलाना दंडनीय अपराध है। उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के निर्देशों के तहत सेटेलाइट के माध्यम से निगरानी की जा रही है। नियम उल्लंघन करने पर किसानों पर अर्थदंड लगाया जाएगा। 2 एकड़ से कम भूमि पर 2500 रुपये, 2 से 5 एकड़ पर 5000 रुपये तथा 5 एकड़ से अधिक भूमि पर 15000 रुपये तक का जुर्माना प्रति घटना निर्धारित किया गया है। कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे फसल अवशेष न जलाएं, बल्कि उन्हें खाद बनाकर मृदा की उर्वरता बढ़ाएं और पर्यावरण संरक्षण में योगदान दें।






