आयोग की चेतावनी आदेश का पालन न होने पर गृह सचिव समेत अधिकारियों को होना पड़ेगा पेश
रिपोर्ट : आरपी सिंह
आज़मगढ़। मार्च 2021 में अम्बेडकर नगर में पुलिस हिरासत के दौरान हुई जियाउद्दीन की संदिग्ध मौत के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मामले को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन मानते हुए राज्य के गृह सचिव को निर्देश दिया है कि मृतक के परिजनों को दो माह के भीतर ₹10 लाख का मुआवजा दिया जाए और भुगतान से संबंधित प्रमाण आयोग को उपलब्ध कराया जाए। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2021 में अम्बेडकर नगर पुलिस ने आजमगढ़ जनपद के पवई थाना क्षेत्र के हाजीपुर गांव निवासी जियाउद्दीन को डकैती के शक में हिरासत में लिया था। अगले ही दिन उसकी मौत हो गई। परिजनों ने शव पर गंभीर चोटों के निशान देखकर पुलिस पिटाई से मौत का आरोप लगाया था। इस मामले में एफआईआर दर्ज हुई और आठ पुलिसकर्मियों को नामजद किया गया। हालांकि, वर्ष 2022 में पुलिस ने अपनी फाइनल रिपोर्ट में मौत का कारण “हार्ट अटैक” बताते हुए सभी पुलिसकर्मियों को क्लीन चिट दे दी। परिजनों के विरोध के बाद 2024 में अदालत ने पुलिस की रिपोर्ट को “अधूरी और गलत” करार देते हुए खारिज कर दिया और DSP स्तर की नई जांच का आदेश दिया। मामला फिलहाल पुनः जांच के अधीन है। इस बीच, मृतक के भाई शहाबुद्दीन की ओर से 30 मार्च 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. गजेंद्र सिंह यादव के माध्यम से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई गई। लंबी जांच के बाद आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि जियाउद्दीन को पुलिस द्वारा थाने लाया गया था, इसमें कोई संदेह नहीं है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर आठ चोटों की पुष्टि हुई, लेकिन पुलिस यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि ये चोटें कैसे और कब लगीं। आयोग ने अपनी टिप्पणी में कहा कि प्रस्तुत रिपोर्ट इस अहम तथ्य पर मौन है कि हिरासत के दौरान चोटें कैसे आईं। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि मौत पुलिस हिरासत में नहीं हुई। आयोग ने आशंका जताई कि पुलिस अपनी गलती छिपाने के लिए भ्रामक रिपोर्ट पेश कर रही है। NHRC ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित अवधि में मुआवजे का भुगतान नहीं किया गया तो वह संरक्षण मानवाधिकार अधिनियम, 1993 की धारा 13 के तहत संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति के आदेश जारी करेगा। वहीं, जियाउद्दीन के भाई शहाबुद्दीन ने आरोप लगाया कि आयोग के आदेश के बावजूद अभी तक मुआवजा नहीं दिया गया है और उनके भाई की मौत पुलिस उत्पीड़न का नतीजा थी।


