आजमगढ़ : चार साहिबज़ादों व माता गुजरी जी की महान शहादत को किया गया नमन

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श्री सुंदर गुरुद्वारा मातबरगंज में श्रद्धा व भक्ति के साथ हुआ कथा आयोजन
ज्ञानी जगबीर सिंह ने संगत को सुनाई शहादत की प्रेरक गाथा
आजमगढ़। मातबरगंज स्थित श्री सुंदर गुरुद्वारा में 24 दिसंबर की शाम 7 बजे चार साहिबज़ादों एवं माता गुजरी जी की महान शहादत को समर्पित विशेष कथा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अमृतसर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से पधारे ज्ञानी जगबीर सिंह जी ने कथा के माध्यम से संगत को चार साहिबज़ादों और माता गुजरी जी के त्याग, साहस और धर्मनिष्ठा की प्रेरक गाथा सुनाई। कार्यक्रम में सभी धर्मों के लोगों ने सहभागिता की और चार साहिबज़ादों एवं माता गुजरी जी की महान शहादत को नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। कथा के दौरान सिख धर्म के मूल सिद्धांत—ईश्वर की एकता, समस्त मानव जाति की समानता और पीड़ितों की रक्षा—पर विशेष प्रकाश डाला गया। ज्ञानी जगबीर सिंह ने बताया कि गुरु गोबिंद सिंह और माता जीतो जी के चार पुत्र—साहिबज़ादा अजीत सिंह, साहिबज़ादा जुझार सिंह, साहिबज़ादा जोरावर सिंह और साहिबज़ादा फतेह सिंह बचपन से ही साहस, निस्वार्थता और न्याय के संस्कारों में पले-बढ़े। आनंदपुर साहिब के आध्यात्मिक वातावरण में उन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा को जीवन का उद्देश्य बनाया। कथा में आनंदपुर साहिब की घेराबंदी और चमकौर के युद्ध (1704) का उल्लेख करते हुए बताया गया कि साहिबज़ादा अजीत सिंह और साहिबज़ादा जुझार सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में अद्वितीय वीरता का परिचय देते हुए धर्म की रक्षा में शहादत प्राप्त की। वहीं, साहिबज़ादा जोरावर सिंह और साहिबज़ादा फतेह सिंह को माता गुजरी जी के साथ सरहिंद में बंदी बनाकर रखा गया। धर्म परिवर्तन के प्रलोभन को ठुकराते हुए दोनों बाल साहिबज़ादों ने अपने धर्म पर अडिग रहते हुए 26 दिसंबर 1705 को शहादत स्वीकार की। जिस स्थल पर यह घटना घटी, वह आज फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारा के रूप में श्रद्धा का केंद्र है। समापन पर संगत ने एक स्वर में शहादत से प्रेरणा लेने और मानवता, समानता व न्याय के मूल्यों पर चलने का संकल्प लिया।

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